महात्मा गांधी के जीवन का आखिरी साल हमारे इतिहास की कुछ सबसे त्रासद घटनाओं का साक्षी रहा है। यह वह वक़्त था जब भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का महानायक अचानक देश का सबसे अकेला, सबसे उदास, सबसे उपेक्षित व्यक्ति नज़र आने लगता है।

उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था।

उन्होंने नहीं चाहा कि देश का बंटवारा हो, लेकिन उनके सत्ता-लोलुप शिष्यों ने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए देश के टुकड़े कर डाले। उन्होंने नहीं चाहा कि देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हों, लेकिन देश धर्म के नाम पर इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार का साक्षी बना। उन्होंने नहीं चाहा कि आज़ादी के बाद एक राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस का अस्तित्व कायम रहे,लेकिन कांग्रेस ने सत्ता संभाली और आज भी एक राजनीतिक परिवार की महत्वाकांक्षाओं का बोझ ढो रही है। उन्होंने नहीं चाहा कि आज़ाद भारत में धार्मिक कट्टरताओं के लिए कोई जगह रहे, लेकिन वे ख़ुद धार्मिक कट्टरपंथियों के हाथों मारे गए।

उन्होंने सत्य और अहिंसा के रूप में ज़ुल्म से लड़ने के सबसे कारगर हथियार हमें दिए और हमने धार्मिक और राजनीतिक आतंकवाद की आड़ में देश को क़त्लगाह बना दिया। उनका सत्याग्रह भीड़तंत्र में तब्दील हो गया। कुटीर और ग्रामोद्योग के सहारे आत्मनिर्भर गांवों की उनकी परिकल्पना को बेरहमी से हमने बहुराष्ट्रीय कंपनियों और देश के कॉरपोरेट घरानों के हाथों बेच दिया। राजनीतिक शुचिता की उनकी अवधारणा रिश्वतखोरी, घोटालों, मक्कारियों और जुमलाबाजियों की भेंट चढ़ गई। उनकी हत्या के बाद हमने चौक-चौराहों पर उनकी मूर्तियां खड़ी की, सरकारी दफ्तरों और करेंसी नोटों में उनकी तस्वीरें टांगी और उनकी आत्मा को देश-निकाला दे दिया।

भारतीय इतिहास के सबसे उपेक्षित महानायक मोहनदास करमचंद गांधी की पुण्यतिथि (30 जनवरी) पर शर्मिंदा राष्ट्र की श्रद्धांजलि !