ऐसे भगवान को पूजें ही क्यों स्त्री जो स्त्री के प्रवेश से अपवित्र होता हो? जिस दिन स्त्री ने इस तथाकथित धर्म से जिसकी सारी रीतियों, कुरीतियों, परंपराओं को स्त्री वहन करती है मुँह मोड़ लिया ठेकेदारों के पाँव तले से जमीन खिसक जाएगी।

अयप्पा बाल ब्रह्मचारी हैं डरते हैं चालीस साल तक की स्त्री के दर्शन कर लेने पर अपने पिता शिव के मोहिनी पर आसक्त होने की तरह कहीं वे किसी स्त्री के प्रति आसक्त न हो जाएँ। मोहिनी तो खैर विष्णु जी थे और विष्णु उनके भीतर से उपन्न। कोई खुद पर मुग्ध हो सकता है। मगर कमाल ये है भगवान भी इतने कमजोर जिन्हें अपना ब्रह्मचर्य सम्भालने के लिए स्त्री को "मुझसे दूर रह मैं डोल जाऊँगा, मुझसे दूर रह मैं डोल जाऊँगा" कहना पड़ता हैं। अब वे कमजोर या उनके ठेकेदार ये तो वही जाने शायद उन्हें भगवान में अपनी सूरत दिख रही होगी। जय हो स्त्री शक्ति की उसके सामने भगवान भी विवश बेचारा अपने ब्रह्मचर्य को संभाल नहीं पाता। इसलिए तो एक भी देवता पत्नीव्रत नहीं मिलता सता शब्द डिक्शनरी में नहीं सती बनकर रहना स्त्री के बल में निहित है। 

पुरुष देवता भगवान भी उसके सामने बेचारे कितने निरीह कितने कमजोर कितने विवश। वे विवश या उनका ये रूप ठेकेदारों ने गढ़ा ये शोध का विषय है। जो शिव कामदेव को ही भस्म कर डालते हैं जिस शिव को पाने के लिए पार्वती को तपस्या करनी पड़ती है। वे शिव विष्णु के मोहिनी रूप जिसे वह जानते हैं कि राक्षसों का नाश करने को विष्णु ने ये मोहिनी रूप समुन्द्र मंथन के लिए धरा है वे पुरुष ही हैं। उसके प्रति आसक्त हो जाते हैं। कोई एक देवता तो छोड़ दिया होता जिसे मजबूत कह पाते। 

ठेकेदारों ने कुछ ब्रह्मचारी देवता गढ़े हमने मान लिया। वे ब्रह्मचारी, हम उन्हें पिता मानेंगे वे हमें देखकर संयम नहीं रख पाएँगे, उनका ब्रह्मचर्य डोल जाएगा, ये सब धर्म के लेखकों ने लिखा। आखिर लिखते वक्त लेखन में इंसान का अपना व्यक्तित्व भी पात्र में उतर आता है। ये जो मान्यता है ये पण्डे पुजारियों द्वारा पाली जा रही है। ये उस लेखक की अपने व्यक्तित्व की देन है जिसने शिव का भी सत्यानाश कर अयप्पा का निर्माण किया। खैर मानो तो भगवान न मानो तो पत्थर। अगर हम किसी भी रूप में किसी वस्तु को भगवान मान लेते हैं भगवान स्वयम को उसी में स्थापित कर लेते हैं। मगर भगवान को इतना दुर्बल, कमजोर, निरीह विवश न बनाओ उसे अपना ब्रह्मचर्य सम्भालने के लिए स्त्री से दूर भागना पड़े। अपने व्यक्तित्व की कमजोरियाँ भगवान पर मत चेपो। अगर हम अयप्पा की मूर्ति अपने मन्दिर में स्थापित कर पूज लेंगे तब अयप्पा भगवान कहाँ भागकर जाएगा? और अगर हम ऐसे भगवान को न खुद पूजें न परिजनों को जाने दें तब ये ठेकेदार क्या करेंगे?

शक्ति के बिना शिव का क्या वजूद, लक्ष्मी के बिना क्या विष्णु का, भक्तों से दान मांगते हैं। स्त्री से है पुरुष का वजूद और पुरुष से स्त्री का क्योंकि दोनों एक शरीर के दो हिस्से।ब्रह्मचारी तो विवेकानंद भी हनुमान भी वे तो नहीं डरकर भागे या भगाई स्त्री।