मोदी सरकार के 'ग़रीब सवर्ण' आरक्षण पर चर्चा गरम है। पर सवाल यह है कि क्या इसका फ़ायदा उनको मिलेगा जिनको ध्यान में रख कर यह किया गया है या करने की बात की गई है?

क्या वाक़ई 'ग़रीब' सवर्ण इस फ़ैसले का लाभ उठा पाएगा? मेरा अपना मानना है कि इस से ग़रीब को कोई फ़ायदा नहीं होगा। उलटे उनके मौक़े पहले से एक चौथाई रह गए हैं! आप सुन कर हैरान हो गए होंगे! इस वक़्त सरकार के फ़ैसले से सवर्णों को लग रहा है कि उनकी तो लॉटरी निकल गई है क्योंकि उनको अब आसानी से नौकरी मिल जायेगी। आरक्षण उनके लिये नये अवसर के दरवाज़े खोलेगा। किसी ग़लतफ़हमी में नहीं रहिएगा। ऐसा कुछ नहीं होगा। पहले ग़रीब सवर्ण भी जनरल कैटेगरी में आवेदन करते थे, जिसमें कुल सीटों की पचास फ़ीसदी से ज़्यादा सीटें आती थीं। लेकिन नयी आरक्षण व्यवस्था में तो केवल 10% सीटें ही रखी गई हैं।

यानी जो भी उम्मीदवार इस व्यवस्था के तहत आरक्षण का लाभ उठाना चाहेगा, उसे आरक्षित दस फ़ीसदी कोटे में ही प्रतिस्पर्धा करनी होगी। बाक़ी के चालीस फ़ीसदी कोटे के लिए उसका दावा ख़ारिज हो जायेगा। वह जनरल में तभी 'कंपीट' कर पाएगा, जब वह आरक्षण की माँग नहीं करेगा।

अगर वह इसकी माँग करेगा तो फिर उसे दस फ़ीसदी कोटे में ही नौकरी पानी होगी।

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बहुत साफ़ है। दीपा ई वी ने ओबीसी कैटेगरी के तहत आवेदन दिया था। चूँकि जनरल कैटेगरी में परीक्षा के 'मिनिमम कट ऑफ़ प्वाइंट' पर कोई उम्मीदवार पास नहीं हुआ तो दीपा ने यह अपील की कि उसे जनरल कैटेगरी के तहत नौकरी के लिए योग्य माना जाए। सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया। दीपा ने हाई कोर्ट में इस फ़ैसले को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने उसकी अपील ख़ारिज कर दी। दीपा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की बात मानी और दीपा की दलील ख़ारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अपीलकर्ता ने ओबीसी कैटेगरी के तहत उम्र में रियायत ली, और इंटरव्यू भी ओबीसी कैटेगरी में ही दिया, इसलिए उसे जनरल कैटेगरी में नौकरी नहीं मिल सकती।” आरक्षण का अर्थ ही होता है कि जो कमज़ोर है, उनके लिए विशेष रियायत दी जाए ताकि वह प्रतिस्पर्धा के लायक़ बने। आरक्षण उन्हें ही दिया जाता है जो किन्हीं कारणों से कमज़ोर हैं, पिछड़ गए हैं और वे जनरल कैटेगरी में कंपीट नहीं कर सकते। और इसलिए वे कभी भी समाज की मुख्य धारा में नहीं आ पाएँगे। नौकरियाँ हो या शिक्षण संस्थान, उनको जगह नहीं मिल पाएगी और वे पिछड़े ही बने रह जाएँगे।

क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का आदेश?

एससी/ एसटी और ओबीसी कैटेगरी में आने वालों को प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के समय उम्र, लिखित परीक्षा में अवसर की संख्या और अनुभव के मामले में रियायत दी जाती है। इनके लिए परीक्षाओं का 'कट ऑफ़ प्वाइंट' भी जनरल कैटेगरी से कम होता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा, “एससी/ एसटी और ओबीसी कैटेगरी से रियायत लेने के बाद ऐसे उम्मीदवारों के लिए जनरल कैटेगरी का फ़ायदा लेने के लिए साफ़ सीमा तय की गई है।” डिपार्टमेंट ऑफ़ परसोनेल और ट्रेनिंग का नियम भी स्पष्ट है कि “जब एससी/ एसटी और ओबीसी कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए रियायत दी जाती है, उम्र की सीमा, अनुभव, योग्यता और लिखित परीक्षा में अवसरों की संख्या में जनरल कैटेगरी की तुलना में ज़्यादा रियायत दी जाती है, ऐसे में ऐसे उम्मीदवार जनरल कैटेगरी के लिए अयोग्य माने जाएँगे।”

गुजरात हाई कोर्ट का भी एक फ़ैसला

इसी तरह, 2015 में गुजरात हाई कोर्ट का भी एक फ़ैसला है। नीलेश राजेंद्रकुमार के मामले में हाई कोर्ट ने कहा, “अगर आरक्षण के तहत उम्मीदवारों ने रियायत ली है तो उन्हें फिर जनरल कैटेगरी में रिक्त स्थान के लिए उपयुक्त नहीं माना जाएगा। वह आरक्षित कैटेगरी में ही फ़ायदा ले पाएगा।” इन दोनों फ़ैसलों से साफ़ है कि अब जो सवर्ण मोदी सरकार के फ़ैसले के बाद आर्थिक आधार पर आरक्षण का लाभ लेंगे, वे फिर बाक़ी बचे चालीस फ़ीसदी के जनरल कैटेगरी कोटे के लिए अयोग्य हो जाएँगे।

मोदी सरकार ने आरक्षण के लिए 'ग़रीबी' नापने के तीन मानदंड बनाए हैं।

  • वे परिवार जिनकी सालाना आमदनी आठ लाख रुपये से कम है।
  • ऐसे परिवार जिनके पास पाँच एकड़ से कम ज़मीन है।
  • ऐसे परिवार जो 1000 वर्ग फ़ुट से कम के मकान के मालिक हैं।

इस कैटेगरी में आने वाले परिवार ग़रीबी के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण के योग्य होंगे। ये फ़ैसला ऊपर से देखने में काफ़ी आकर्षक लगता है, पर हक़ीक़त में मोदी सरकार के फ़ैसले से जो ग़रीब सवर्ण खुश हो रहा है, यह उसके लिए बड़े घाटे का सौदा है।

कितनी जनसंख्या आएगी दायरे में?

'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' में छपी एक ख़बर के मुताबिक़ देश में ऐसे 95% परिवार हैं जो आठ लाख रुपये प्रति वर्ष से कम कमाते हैं। इसी तरह कृषि जनगणना 2016-17 के हिसाब से देश में पाँच एकड़ से कम ज़मीन रखने वालों का आँकड़ा 86.6% है। जबकि 1000 वर्ग फ़ुट से कम के मकान के मालिकों का आँकड़ा तक़रीबन 90% है। यानी तक़रीबन आबादी का 90% से ज़्यादा हिस्सा इन पैमानों पर ‘गरीब’ हो जाता है। यह फ़ार्मूला ग़रीब सवर्ण पर भी कमोबेश लागू होता है। यानी आरक्षण देने के लिए जो योग्यता सरकार ने निर्धारित की है, उसके हिसाब से एससी/एसटी/ओबीसी को मिले आरक्षण के बाद बची जनरल कैटेगरी की आबादी के कम से कम 85% लोग ग़रीब सवर्ण आरक्षण के पात्र होंगे। यानी जो भी सवर्ण 'ग़रीब' दस फ़ीसदी आरक्षण के लिए आवेदन करेगा, वह पहले की तरह जनरल कैटेगरी के लिए बाक़ी बचे इकतालिस फ़ीसदी कोटे के लिए अयोग्य हो जाएगा।

यानी 'ग़रीब' सवर्ण जो पहले जनरल कैटेगरी की इक्यावन फ़ीसदी सीटों के लिए कंपीट करता था, अगर वह आरक्षण का लाभ लेना चाहेगा तो सिर्फ़ दस फ़ीसदी के लिए ही कंपीट कर पाएगा। जबकि सामान्य कैटेगरी के बाक़ी बचे 15% सवर्ण इकतालिस फ़ीसदी के जनरल कोटे के लिए कंपीट करेगा। यानी अमीर सवर्ण का काम अब पहले से ज़्यादा आसान हो जाएगा।

इस आरक्षण के बाद 'ग़रीब' सवर्णों की आरक्षित कैटेगरी में मेरिट लिस्ट काफ़ी ऊँची होगी क्योंकि 10% सीटों के लिए अब 85% लोग कंपीट करेंगे। इसके उलट बाक़ी बची 41% सीटों के लिए मेरिट लिस्ट बहुत कम होगी क्योंकि जनरल कैटेगरी में आनेवाले 15% फ़ीसदी लोग सामान्य कोटे में गिनी जाने वाली 41% सीटों के लिये कंपीट करेंगे।

अब आप ही बताएँ कि कौन मज़े में रहा, अमीर सवर्ण या 'ग़रीब' स्वर्ण? अब आप तय करें कि मोदी सरकार ने ग़रीब सवर्णों को फ़ायदा पहुँचाया या अमीर सवर्णों को? ग़रीब के लिए पहले भी नौकरियाँ नहीं थीं, अब वह जो भी थीं, उससे भी बाहर हो गया। क्या यह दिनदहाड़े डकैती है कि नहीं?